वैशाली का इतिहास
वैशाली अपनी पौराणिकता एवं ऐतिहासिकता के लिए विश्व-प्रसिद्ध है.
आज जिले के रूप में भले ही इसका क्षेत्र अत्यंत संकीर्ण हो गया है किन्तु, एक वक्त था जब इसकी सीमा के अंतर्गत आज का दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, शिवहर, सीतामढ़ी, मुज़फ्फरपुर, पश्चिमी एवं पूर्वी चम्पारण, सिवान, सारण तथा गोपालगंज का क्षेत्र शामिल था. इतिहास के विभिन्न कालखंड में विदेह अथवा मिथिला का क्षेत्र भी कभी इसका पडोसी तो कभी इसका अंग रहा था. कोशल तथा मगध इसके पडोसी राज्य हुआ करते थे तो उत्तर में इसकी सीमा नेपाल से मिलती थी. ईसा पूर्व सातवीं सदी में उत्तरी और मध्य भारत के महाजनपदों में वैशाली का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण था. नेपाल की तराई से लेकर गंगा के बीच फैली हुई भूमि पर वज्जियों तथा लिच्छवियों के अष्टकुल द्वारा गणतांत्रिक शासन व्यवस्था की शुरूआत की गई थी. इसलिए विश्व को सर्वप्रथम गणतंत्र का ज्ञान देनेवाला स्थान वैशाली ही है.
विष्णु पुराण में इस क्षेत्र पर राज्य करनेवाले 34 राजाओं का उल्लेख है, जिसमे प्रथम नमनदेष्टि तथा अंतिम सुमति थे. सुमति को अयोध्या के राजा दशरथ का समकालीन माना गया है. कहा जाता है कि मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम ने अपने अनुज लक्ष्मण एवं गुरु विश्वामित्र के साथ सीता-स्वयंवर में जाते हुए वैशाली नगरी में विश्राम किया था. प्रमाणस्वरुप आज भी हाजीपुर में नदी किनारे उनके चरण चिह्न पर रामचौरा मंदिर अवस्थित है. श्रीमद् भागवत पुराण में गजेन्द्रमोक्ष की कथा है, जिसके अनुसार गजेन्द्र के पैर को जब मगरमच्छ ने जकड लिया और पानी में खींच लिया तो अनेक काल तक दोनों में खींचतान चलती रही. आखिर स्वयं को अशक्त पा जब गजेन्द्र ने भगवान विष्णु को रक्षार्थ पुकारा तो भक्त की पुकार पर भगवान नंगे पांव दौड़े और अपने सुदर्शन से मगरमच्छ का शिरोच्छेद कर भक्त की रक्षा की. भगवान विष्णु की वह प्राकट्य भूमि हाजीपुर (वैशाली) का कौनहारा घाट है, जहां सदियों से प्रत्येक वर्ष कार्तिक पूर्णिमा को लाखों श्रद्धालु आकर सदानीरा गंडक नदी के पावन जल में डुबकी लगाते हैं. इसी के दूसरे किनारे पर इस दिन सोनपुर का विश्वप्रसिद्ध पशु मेला लगता है.
राजनीतिक-ऐतिहासिक संदर्भ
राजा सुमति के शासनकाल के बाद से वज्जी गणतंत्र की स्थापना के बीच के लगभग छह शताब्दियों का वैशाली के इतिहास का अंधकार युग है. आगे जो सन्दर्भ उपलब्ध हैं, उनका आधार बौद्ध साहित्य है. उससे पता चलता है कि बुद्ध (567-487 ई.पू.) के समय वज्जि गणतंत्र एक सुव्यवस्थित संस्था थी. स्वयं बुद्ध ने उसकी भूरी-भूरी प्रशंसा की थी और उसकी सात विशेषताओं का वर्णन किया था. वैसे समझा जा सकता है कि यह व्यवस्था निश्चित ही और भी पुरानी रही होगी, क्योंकि ऐसी किसी सुंदर एवं सुदृढ़ व्यवस्था का निर्माण अल्प अवधि में तो संभव नहीं हुआ होगा. बुद्ध को वैशाली नगरी अत्यंत प्रिय थी, जबकि वे मगध के राजा अजातशत्रु के किशोरावस्था के मित्र थे और अपना अधिकांश समय मगध में ही बिताते थे. कहते हैं कि बुद्धत्व प्राप्ति के बाद जब बुद्ध पहली बार मगध की राजधानी राजगृह में पधारे थे तो अजातशत्रु ने राजमार्ग पर स्वागत करते हुए अपना राजमुकुट उनके चरणों में डाल दिया था.
वैशाली के वेणुग्राम में ही बुद्ध ने अपने जीवन का अंतिम वर्षावास भी किया था. वहीँ माघ-पूर्णिमा को उन्होंने घोषणा की थी कि तीन मास बाद वे परिनिर्वाण को प्राप्त होंगे. उस बार वैशाली में उन्होंने सात-आठ महीने बिताये थे. वैशाली छोड़ते हुए उन्होंने अपने पीछे आते हुए शोकग्रस्त लिच्छवियों को अपना भिक्षापात्र देकर आग्रहपूर्वक लौटाया. वैशाख-पूर्णिमा (487 ई.पू.) को कुशीनगर में उनका महापरिनिर्वाण हुआ. उनके अस्थि अवशेषों को आठ भागों में विभक्त किया गया, जिसका एक भाग वैशाली को भी प्राप्त हुआ. लिच्छवियों ने भगवान की अस्थियों के ऊपर एक स्तूप का निर्माण किया और उनकी पूजा करने लगे. मार्च 1958 में वैशाली स्थित खरौना पोखर के उत्तर-पूर्व हरपुर वसंत नामक गाँव में ज़मीन का एक टीला खोदा गया था जिसमे से उनका उक्त अवशेष कलश प्राप्त हुआ, जो आज भी संग्रहालय में सुरक्षित रखा है.
काश्यप गोत्रीय वर्धमान महावीर का जन्म वैशाली के समीप कुन्डग्राम के नायक सिद्धार्थ एवं देवी त्रिशला (वैशाली के ‘राजा’ चेतक की बहन) के पुत्र के रूप में हुआ था. करीब तीस वर्ष की आयु में (532 ई.पू,) गृह त्याग कर उन्होंने तपस्या शुरू की थी. बारह वर्षों की कठोर तपस्या के बाद उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ. वे बहुत बार वैशाली आये और यहाँ उपदेश किया. उनके बारह वर्षावास यहाँ के वाणिज्य ग्राम (वर्तमान में बनिया) में हुए.
चौथी सदी ई.पू. के अंत में चन्द्रगुप्त मौर्य (325-301 ई.पू.) के प्रधान मंत्री कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में लिच्छवियों एवं वृज्जिकों के संघों (गणतंत्री शासकीय इकाइयों) का उल्लेख किया है. इस के अनुसार मौर्य काल में ही संघ दो भागों में बंट गया था. लिच्छवि संघ एवं वृज्जी संघ. लिच्छवि संघ तो वैशाली में रहा किन्तु वृज्जी संघ कहाँ गया? यह वैशाली के किसी भाग में रहा अथवा मिथिला या नेपाल में चला गया. इसकी निश्चित जानकारी नहीं है. पतंजलि (160 ई.पू.) ने मिथिला को गणतंत्री राज्य माना है. हो सकता है मगध के नंदवंश के संस्थापक महापद्म नन्द ने मिथिला पर विजय प्राप्त कर उसे सीधे अपने साम्राज्य का प्रान्त न बनाकर अपने अधीन रखा हो. सातवी सदी में नेपाल की ओर वृज्जी नामक राज्य का उल्लेख चीनी यात्री हुएनसांग ने किया है. अत: अर्थशास्त्र में उल्लिखित वृज्जी संघ का उस ओर चला जाना भी संभव है, क्योंकि इसके बाद भारतीय साहित्य में कहीं भी वृज्जी का उल्लेख नहीं मिलता है.
ऐसा प्रतीत होता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य के बाद लिच्छवी-संघ की शासन सम्बन्धी स्वतंत्रता ख़त्म हो गई क्योंकि उसके पोते अशोक के अभिलेखों में लिच्छवियों का उल्लेख नहीं है. उस समय वैशाली को एक सैनिक छावनी के रूप में परिवर्तित कर दिया गया था, जैसा कि एक छोटे से अभिलेख में प्राप्त होता है. अशोक (269-232 ई.पू.) ने बसाढ़ के करीब कोल्हुआ ग्राम में एक स्तंभ खडा कराया, जिस पर उत्तर की ओर मुंह करके एक सिंह बैठा है. इस पर कोई अभिलेख नहीं है. 1958-59 की खुदाई में वैशाली में अग्निमित्र की मुहर पाए जाने से सहज ही विश्वास किया जा सकता है कि कम से कम दो शुंग-वंशीय राजाओं, पुष्यमित्र एवं अग्निमित्र ने वैशाली पर मगध का अधिकार कायम रखा.
जब मगध के शुंग वंश के राजा कमज़ोर पड गए तो वैशाली के लिच्छवी स्वतंत्र हो गए. उन्होंने पुन: अपनी राजनीतिक शक्ति इकट्ठी की और मगध पर अधिकार कर लिया. तब लिच्छवियों ने अपना ध्यान व्यापार, कला और धर्म की ओर लगाया. वैशाली में विशाल के गढ़ की खुदाई से पता चलता है कि 150 ई.पू. से 100 ई.पू. के बीच का युग प्राचुर्य एवं कलात्मक क्रियाशीलता का युग था. उस समय बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म, दोनीं का अत्यधिक विकास हुआ, जिससे चिढ कर ब्राह्मणों ने लिच्छवियों को व्रात्य क्षत्रिय कह डाला था (मनुस्मृति : 10/22).
कुषाण और गुप्त काल
पहली सदी ईस्वी के अंतिम चरण में वैशाली पर कनिष्क नामक कुषाण सम्राट का राज हो गया. बुद्ध के भिक्षा पात्र को वह अपने साथ अपनी राजधानी पेशावर ले गया. आगे चलकर फिर उसके कमज़ोर उत्तराधिकारियों से लिच्छवियों ने खुद को पुन: मुक्त कर लिया. धीरे-धीरे वैशाली की प्रतिष्ठा बहुत बढ़ने लगी. व्रात्य कहलाने के बावजूद उनके साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करना सम्मानप्रद समझा जाने लगा. चौथी सदी ईस्वी के प्रारंभ में चन्द्रगुप्त प्रथम नामक गुप्त राजकुमार का कुमारदेवी नामक लिच्छवी दुहिता से विवाह हुआ. ऐसा माना जाता है कि चन्द्रगुप्त प्रथम को वैशाली दहेज़ में दे दी गई, क्योंकि इसके बाद यहाँ लिच्छवियों का नाम कहीं सुनाई नहीं पड़ता (नेपाल में वे 879 ई. तक राज करते रहे). इस विवाह के समर्थन में दो प्रमाण हैं. (1) चन्द्रगुप्त प्रथम के सिक्के जिनकी एक ओर ‘चन्द्रगुप्त’ और ‘श्रीकुमारदेवी’ अंकित है और दूसरी तरफ ‘लिच्छवय:’ शब्द लिखा है. (2) गुप्तकालीन अभिलेखों में चन्द्रगुप्त प्रथम के पुत्र समुद्रगुप्त के लिए ‘लिच्छविदौहित्र’ विरुद का प्रयोग बतलाता है कि समुद्रगुप्त एवं अन्य गुप्त राजा लिच्छवियों के साथ अपने संबंध से गर्व का अनुभव करते थे. ‘लिच्छवय:’ लिच्छवी शब्द का बहुवचन है. इससे यह भी समझा जा सकता है कि गुप्त साम्राज्य में शामिल होने के पूर्व लिच्छवियों का शासन गणतंत्रात्मक था.
गुप्तकाल के अंत में एक महत्वपूर्ण घटना घटी. संभवत: अपना गौरव क्षीण होता देख लिच्छवियों का एक बड़ा दल वैशाली छोड़ नेपाल जा पहुंचा और वहीँ राज्य की स्थापना कर शासन करने लगा. वहाँ उनकी शासन-पद्धति गणतंत्रात्मक न होकर राजतंत्रात्मक रही. छठी सदी ईस्वी का अंत होते-होते वैशाली का पतन हो गया. खुदाई की रिपोर्ट से पता चलता है कि करीब 600 ई. में बसाढ़ का गढ़ वहाँ के निवासियों ने छोड़ दिया. वैशाली वीरान हो गई.
सातवीं सदी के प्रारंभ में वैशाली जनपद थानेश्वर-कन्नौज के राजा हर्षवर्धन (606-647 ई.) के अधीन हो गया. जब प्रसिद्ध चीनी बौद्ध यात्री हुएनसांग (629-645) वैशाली पहुंचा तो उसने वैशाली को ध्वस्त पाया. स्पष्ट है कि वैशाली अब प्रांतीय राजधानी नहीं थी तथा पाटलिपुत्र और श्रावस्ती के भी ध्वस्त हो जाने के कारण यह व्यापार मार्ग बंद हो चुका था. हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद वैशाली एवं नेपाल पर तिब्बत का राज हो गया, जिससे वे क्रमश: 703 एवं 704 में मुक्त हुए. इसके बाद कुछ काल के लिए जीवगुप्त, जो रामगुप्त का पुत्र था, का राज्य हुआ और फिर यहाँ पाल वंश का राज प्रारंभ हुआ जिसके प्रसिद्ध राजा धर्मपाल, देवपाल, महीपाल, विग्रहपाल आदि हुए. ये सभी बौद्धधर्मावलम्बी थे और उनके स्कंधावार वैशाली से दूर हुआ करते थे.
तिरहुत के कर्नाट वंशी राजा ब्राह्मण धर्मावलम्बी थे और उनकी राजधानी सिमरावगढ़ थी जो वैशाली के अपेक्षाकृत समीप थी. नान्यदेव (1097-1145) ने पाल राजा रामपाल से तिरहुत छीनकर स्वतंत्र राज्य कायम किया. इसने गंगा के उत्तर वाले बड़े क्षेत्र में जो घाघरा नदी (सिवान-सारण जिलों) से कोशी नदी तक विस्तृत था, अपना दबदबा फैलाया. इसने नेपाल के समस्त तराई वाले भाग पर भी अधिकार जमाया. इस तराई भाग में प्राचीन विदेह की राजधानी मिथिला (वर्तमान जनकपुर) भी शामिल थी.
इसी वंश के राजा नरसिंह देव अथवा नृसिंहदेव (1188-1227) को पहली बार मुस्लिम आक्रमणकारियों का सामना करना पड़ा. यह वह समय था, जब दक्षिण बिहार (1199-1201) और बंगाल (1201-03) पर अधिकार कर मुस्लिम शासक उत्तर बिहार की ओर ललचाई नज़रों से देख रहे थे. राजगृह एवं उड्यंतपुरी यानी बिहारशरीफ से जैनमतावलम्बी भागकर समीप के पावापुरी नामक ग्राम में श्री महावीर की प्रतिमा स्थापित कर उनकी पूजा की व्यवस्था कर रहे थे.(1203). चारों ओर उथलपुथल और अस्थिरता का माहौल था. बंगाल के सुल्तान अलाउद्दीन अलीमर्दान खल्जी (1210-13) और अवध के मुस्लिम सूबेदार दोनों ने तिरहुत के हिन्दू राज्य पर आक्रमण कर उसे तबाह किया.
तिब्बती बौद्ध यात्री धर्मस्वामी ने 1234 से 1236 के बीच की अपनी भारत यात्रा के विवरण में लिखा है कि तुरुक सैनिकों के कारण वैशाली में हलचल मची हुई है तथा लोगों में अरक्षा की भावना भरी हुई है. धर्मस्वामी के इस कथन का समर्थन पूर्वी भारत में पाए गए बिहारशरीफ के 1242 के अरबी अभिलेख तथा मुस्लिम इतिहास से होता है. तुगरिल तुगान खान (मृत्यु 1247) ने 1230 में दिल्ली की सुल्तान रज़िया से बिहार और बंगाल की सूबेदारी ले ली थी और इस पद पर वह 1245 तक रहा. उसने तिरहुत पर आक्रमण कर बहुत लूटपाट मचाया और अवध के कुछ भागों पर अपना प्रभाव फैलाया. इस प्रकार लगातार आक्रमणों से यह क्षेत्र कमज़ोर होता चला गया. तिरहुत का अंतिम राजा हरिसिंह देव हुआ. उस पर दिल्ली के तुर्की सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक (1320-1325) ने बंगाल से दिल्ली लौटते समय हमला किया और 1324 के अंत में उसे हराकर इस हिंदु राज्य को समाप्त कर दिया और यह क्षेत्र दिल्ली सल्तनत के अधीन हो गया.
वैशाली नगरी के मुख्य भाग के उजाड़ हो जाने के बाद (600 ई. या इसके कुछ पूर्व) इसके भाग्य में जो उतार चढाव आये, इसके कारण वैशाली के लोग यहाँ-वहाँ दूर-दूर तक विस्थापित होते चले गए. लिच्छवी तो पहले ही नेपाल जा चुके थे, जैन मतावलम्बी भी पश्चिम और दक्षिण भारत चले गए. वैशाली के उपनिवेशक अराकान (बर्मा) भी पहुंचे, где उन्होंने वेथाली (वैशाली या वैशाली) नामक नगर बसाया. यहाँ वैशाली-वंश के राजाओं ने 878 से 1018 ई. तक राज किया. वर्मा के बौद्ध राजा अनिरुद्ध (राजत्वकाल 1044-1077) ने वैशाली की राजकुमारी से विवाह किया, इस तरह उस काल में वैशाली का वर्मा से बहुत घनिष्ट सम्बन्ध रहा.
उत्तर बिहार में न्याय और मीमांसा दर्शन ने बहुत प्रगति की. न्याय के क्षेत्र में उद्द्योत्कर (635 ई.), अन्हरा-ठाढ़ी (मधुबनी जिला) के वाचस्पति मिश्र (841 ई.) और करियन (समस्तीपुर) के उदयन अथवा उदयनाचार्य (984 ई.) के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं. मीमांसा के क्षेत्र में कुमारिल भट्ट, मंडन मिश्र, प्रभाकर और मुरारी मिश्र के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं. तेरहवीं सदी के प्रारंभ में मंगरौनी (मधुबनी जिला) के गंगेश उपाध्याय ने नव्य न्याय की स्थापना की. इन सभी दार्शनिकों ने बौद्ध धर्म एवं जain धर्म की आलोचना की और ब्राह्मण धर्म को पुन: प्रतिष्ठित करने का प्रयत्न किया.
इस युग में ब्राह्मण धर्म के प्रति वैशाली क्षेत्र की एक विशिष्ट देन है – शालिग्राम पत्थर का विष्णु रूप में पूजन. अन्य भारतीय धर्मों के समान ब्राह्मण धर्म में भी मूर्ति पूजा बहुत पहले से आ रही थी. विष्णु और लक्ष्मी की मूर्तियों की पूजा भी अन्य देव मूर्तियों की तरह होती आ रही थी. किन्तु यदि भक्त को कहीं यात्रा आदि पर बाहर जाना होता था तो पूजा में बाधा हो जाती थी. गंडक नदी में छोटे-छोटे चिकने पत्थर मिलते हैं. गण्डक नदी शालवृक्षों से भरे जंगलों से गुजर कर नीचे मैदान में आती है. यह स्थान नेपाल में है. उस स्थान को शालग्राम कहते हैं. यहाँ नदी में चिकने पत्थरों की भरमार है. सो इन पत्थरों को शालग्राम-शिला कहते हैं. इसे ही विष्णु भगवान् की आदर्श प्रस्तर मूर्ति मान ली गई और शालग्राम पूजा चल पड़ी, जो विष्णु पूजा का एक रूप है. इसलिए गंडक को शालग्रामी भी कहते हैं और नारायणी भी. कई पुराणों में शालग्राम पूजन की विस्तृत विधि दी हुई है. इसलिय यह सहज स्वीकार्य है कि यह पूजा इस युग में गंडक घाटी से प्रारंभ होकर दूर तक फैली.
इसी समय गज-ग्राह युद्ध कथा और गजेन्द्रमोक्ष क्षेत्र (गंगा-गंडक संगम क्षेत्र) की महिमा भी बढ़ी, जिसका वैष्णव धर्म के प्रचार से सम्बन्ध है. हाजीपुर का कोनहारा घाट गजेन्द्रमोक्ष क्षेत्र का वर्तमान प्रतिनिधि है. जनकपुर और सीतामढ़ी से लेकर गण्डक नदी एवं वाल्मीकि आश्रम तक अनेक ऐसे स्थान हैं जो विदेह के राजा जनक की पुत्री और कोशल के राजा राम की पत्नी सीता के जीवन की विविध घटनाओं से जुड़े हैं. निश्चय ही इस युग में इन स्थानों का महत्व बढ़ा. नए तीर्थ बने और रामनवमी एवं विवाह पंचमी जैसे उत्सव और मेले लगने लगे. इन सब बातों का वैष्णव धर्म एवं शालिग्राम पूजन के प्रसार पर यथेष्ट प्रभाव पड़ा.
सन 1324 में वैशाली पर दिल्ली के तुगलक वंश के अधिकार के साथ इस क्षेत्र ने एक बिलकुल नए युग में प्रवेश किया. लम्बे समय तक यह दिल्ली और बंगाल के शासकों के बीच झूलता रहा. 1529 में बंगाल के सुलतान ने, जो उस समय उत्तर बिहार का भी स्वामी था, प्रथम मुगल बादशाह बाबर की अधीनता मान ली परन्तु सिर्फ नौ बरस बाद फिर इस क्षेत्र पर पठानों (अफगानों) का कब्ज़ा हो गया. अगस्त 1574 में तीसरे मुगल बादशाह अकबर के समय मुगलों ने इस पर अंतिम रूप से अधिकार प्राप्त कर लिया.
चौदहवीं और पंद्रहवीं सदियों में वैशाली क्षेत्र में तीन बड़ी घटनाएं घटीं-
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वैशाली क्षेत्र पर मुस्लिम अधिकार.
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बंगाल के सुलतान शमसुद्दीन हाजी इलियास द्वारा दो शहरों – शम्सुद्दीनपुर (समस्तीपुर) और हाजीपुर की स्थापना;
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शेख मुहम्मद काजीन शुत्तारी द्वारा इस्लाम का प्रचार.
मुस्लिम शासन की स्थापना के साथ ही मसजिदों और किलों का निर्माण होने लगा तथा स्थानों के नाम बदले जाने लगे. इस्लाम के प्रचारक इस इलाके में धड़ल्ले से पहुँचने लगे और इस धर्म के प्रचार में विशेष सुविधा हो गई. वक़्त के साथ हाजीपुर एक नगर के रूप में विकसित होता गया और वैशाली नगरी पुरातत्व की चीज रह गई.
बिहार में गंगा के उत्तरी भाग को तिरहुत क्षेत्र कहा जाता है. इसे तुर्क-अफगान काल में स्वतंत्र प्रशासनिक इकाई बनाया गया था. यहाँ के स्थानीय सुल्तान शमसुद्दीन इलियास ने तिरहुत सल्तनत की स्थापना की थी. ब्रिटिश भारत में 1908 में पटना से अलग कर तिरहुत प्रमंडल बनाया गया था, जबकि सन 1875 में ही मुजफ्फरपुर और दरभंगा नामक दो जिले बन चुके थे. तिरहुत प्रमंडल का मुख्यालय भी मुजफ्फरपुर ही रहा, जिसके अंतर्गत मुजफ्फरपुर और दरभंगा के अतिरिक्त सारण और चम्पारण को भी शामिल किया गया.
मुग़ल काल में ही हाजीपुर नगर के विकसित होने के बाद से वैशाली की कोई प्रमुखता नहीं रही. बल्कि, वैशाली और हाजीपुर के मध्य स्थित लालगंज नामक स्थान का विकास एक व्यापारिक केंद्र के रूप में हुआ. अंग्रेजों के ज़माने में वहाँ निलहा कोठी बनी. कलकत्ता शहर को विकसित करनेवाले जॉब चार्नक लालगंज से ही कलकत्ता गए थे. उल्लेखनीय है कि लालगंज की नगरपालिका का गठन हाजीपुर नगरपालिका से पहले हो चुका था. मुजफ्फरपुर जिला के अंतर्गत हाजीपुर अनुमंडल का गठन हुआ था. लालगंज, वैशाली आदि सभी इलाके इसी के अंदर आते थे.
1943-44 में स्व. जगदीशचंद्र माथुर हाजीपुर अनुमंदल के अनुमंदलाधिकारी हुये. विलक्षण प्रतिभा के धनी माथुर साहब एक साथ प्रशासक, साहित्यकार, नाटकविद और लोक-संस्कृति के उपासक थे। उन्होने भारतीय संस्कृति के शास्त्रीय स्वरूप के समानान्तर लोकधर्मी संस्कृति के पुन: संस्कार को भी समान महत्व दिया। विस्मृत और उपेक्षित पड़ी वैशाली के इतिहास को दुनिया के सामने लाने का पुण्य कार्य उन्होने किया । वैशाली में स्थित बसाढ़ ग्राम ही इतिहास में वर्णित वैशाली है, यह सिद्ध करने के लिए उन्होने पुरातत्ववेत्ताओं की मदद से खुदाई करवाई और लिच्छवियों के प्राचीन गढ़ का अन्वेषन किया । न केवल वैशाली के अतीत बल्कि वर्तमान एवं भविष्य को भी गढ़ने में उन्होने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । यहाँ के सांस्कृतिक विकास के लिए वैशाली संघ की स्थापना तथा छोटे किसानों के कृषि-कार्य के आधुनिकीकरण एवं विकास के लिए ‘वास्फा’ (वैशाली एरिया स्माल फार्मर्स एसोसियसन) का गठन कराया । प्रत्येक वर्ष महावीर जयंती के अवसर पर वैशाली गढ़ पर ‘वैशाली-मेला’ का आयोजन शुरू किया जो आज भी जारी है, जहां विशाल मंच पर स्थानीय एवं अतिथि संस्कृतिकर्मियों द्वारा मनमोहक प्रस्तुतियाँ होती हैं ।
भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में वैशाली का योगदान
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में वैशाली की धरती का अमूल्य योगदान था। यूं तो यहाँ के सैकड़ो स्वतन्त्रता सेनानियों के नामों की सूची एवं उनकी वीरता के किस्से कई पुस्तकों में उपलब्ध हैं, फिर भी कुछ प्रमुख हस्तियों का नामोल्लेख यहाँ करना चाहूँगा। जलालपुर(लालगंज) निवासी बैकुंठ शुक्ल एवं योगेन्द्र शुक्ल का नाम आज भी ज़िलावासी बड़े गर्व से लेते हैं। लाहौर षड्यंत्र कांड में जिस फणीन्द्र नाथ घोष की गवाही से भगत सिंह, राजगुरु एवं सुखदेव को फांसी हुई थी, बैकुंठ शुक्ल ने 9 अक्तूबर 1932 को उसकी हत्या कर दी। 14 मई 1934 को मात्र 28 साल की उम्र में वे फांसी चढ़ गए। रिश्ते में उनके चाचा योगेंद्र शुक्ल हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसियसन तथा बिहार काँग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक सदस्य थे। हजारीबाग जैल से दीवार फांदकर जयप्रकाश नारायण को कंधे पर लाद कर भागने वाले वीर सेनानी योगेंद्र शुक्ल का नाम देश के अग्रणी क्रांतिकारियों में शामिल है। देश में स्वतत्रता सेनानियों को प्राप्त होनेवाले ताम्र-पत्र के प्रथम प्राप्तकर्ता पंडित जयनन्दन झा, प्रखर सेनानी अक्षयवट राय, इन सब के राजनीतिक गुरु एवं शीर्ष कम्युनिस्ट नेता किशोरी प्रसन्न सिंह, उनकी जुझारू धर्मपत्नी सुनीति देवी, दाउदनगर निवासी प्रसिद्ध वकील शफी दाऊदी, विंध्यवासिनी सिंह, बसावन सिंह, बच्चन शर्मा, दीपनारायन सिंह, बेनी भगत, चलित्तर शर्मा, अमीर गुरुजी, बाबूलाल शास्त्री, सीताराम सिंह आदि वैशाली के सपूतों की सूची काफी लंबी है।
सौजन्य : शैलेंद्र राकेश
