किरण मण्डल

विस्तृत इतिहास व मूल पाठ

  • 16 मई 1948 — हाजीपुर के बुद्धिजीवियों व कलाकारों द्वारा किरण मण्डल की स्थापना।

  • उद्देश्य: साहित्यिक, सांस्कृतिक और सामाजिक नवजागरण को बढ़ावा देना।

  • संस्थापक प्रेरक: अक्षय कुमार सिंह, जगन्नाथ प्रसाद “किरण”, डा॰ दामोदर प्रसाद, श्रीकांत मिश्र, महावीर प्रसाद शर्मा आदि।

  • 1942–1948 के बीच: हस्तलिखित पत्रिका कलश → बाद में किरण पत्रिका।

  • 18 अक्टूबर 1948 — पहला सार्वजनिक आयोजन कौमुदी महोत्सव

  • 1950–1970 का दशक: किरण मण्डल का स्वर्णिम काल — लगातार कवि सम्मेलन, सांस्कृतिक कार्यक्रम, संगीत समारोह।

  • शीर्ष साहित्यकारों की सहभागिता: दिनकर, अज्ञेय, नागार्जुन, नीरज, गोपाल सिंह नेपाली, काका हाथरसी सहित अनेक।

  • अनेक सह-स्तरीय मंडलों का गठन: संगीत मण्डल (1953), मिलन मण्डल (1954), महिला मण्डल (1957), शिशु-मण्डल (1958)।

  • समय-समय पर किरण पत्रिका का प्रकाशन, बाद में किरण वार्ता (2013 से)।

  • 2025 में: डा॰ दामोदर प्रसाद की असंकलित कविताओं का संग्रह “बेशरम हवा चली” प्रकाशित।

  • वर्तमान नेतृत्व: अध्यक्ष डा॰ व्रजकुमार पाण्डेय, सचिव: डा. शैलेंद्र राकेश।

  • हाल का प्रमुख आयोजन: कौस्तुभ जयंती (प्लैटिनम जुबली) — दो दिवसीय भव्य कार्यक्रम।

  • उद्देश्य की निरंतरता: बदलते तकनीकी दौर में भी साहित्यिक-सांस्कृतिक चेतना को बनाए रखना।

स्थापना की पृष्ठभूमि (1948)

साहित्यिक, सांस्कृतिक संस्था ‘किरण मण्डल’ ने अपनी समृद्ध परंपरा के गौरवशाली 77 वर्ष पूरे कर लिए। सन 1948 की 16 मई को तत्कालीन हाजीपुर के बुद्धिजीवियों, साहित्य-रसिकों, कवि-कलाकारों ने जनपद में साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक उत्प्रेरणा के उद्देश्य से इसका गठन किया था। यह नवजागरण का काल था, भारत को ताजी-ताजी आज़ादी मिली थी और लोगों की आँखों में नया भारत गढ़ने का सपना था।

जगह-जगह स्कूल, कालेज तथा सुदूर गावों में भी पुस्तकालय आदि खुल रहे थे। उस वक़्त हाजीपुर महज़ एक अनुमण्डल हुआ करता था, किन्तु इसकी ऐतिहासिक-धार्मिक महत्ता — गज-ग्राह युद्ध, राम-लक्ष्मण-विश्वामित्र की यात्रा, बुद्ध-महावीर की भूमि, विश्व के प्रथम गणराज्य के रूप में प्रसिद्धि — इसे विशेष पहचान देती थी।

स्वतन्त्रता संग्राम में इस क्षेत्र का योगदान अतुलनीय था। बैकुंठ शुक्ल, योगेंद्र शुक्ल, शफी दाऊदी, जयनन्दन झा, अक्षयवट राय, विंध्यवासिनी सिंह, वेणी बाबू, किशोरी प्रसन्न सिंह, सुनीति देवी आदि स्वतंत्रता सेनानियों की सूची अत्यंत समृद्ध है।


‘किरण’ पत्रिका की शुरुआत (1942–1948)

उसी काल में अक्षय कुमार सिंह — स्थानीय हाई स्कूल के शिक्षक — ने अपने शिष्यों संग हस्तलिखित पत्रिका ‘कलश’ का प्रकाशन शुरू किया (1942)। उनके शिष्य जगन्नाथ प्रसाद ‘किरण’ चित्रकला में दक्ष थे और उनके हाथ की लिखावट और चित्रों से पत्रिका अत्यंत आकर्षक रूप से प्रकाशित हुई।

पत्रिका बाद में ‘किरण’ नाम से जानी गई और श्रीकृष्ण पुस्तकालय में उपलब्ध होती थी। ‘किरण’ और ‘किरणजी’ दोनों ही स्थानीय बुद्धिजीवियों में अत्यंत लोकप्रिय हुए।


किरण मण्डल का औपचारिक गठन (1948)

स्वतन्त्रता के तुरंत बाद, 1948 में साहित्यिक-सांस्कृतिक नवजागरण को लक्ष्य बनाकर, हाजीपुर के प्रतिष्ठित वकील जगन्नाथ प्रसाद तिवारी की अध्यक्षता में किरण मण्डल का गठन हुआ।

डॉ. दामोदर प्रसाद इसके संस्थापक सचिव बने।
इसके सक्रिय सहयोगियों में पं. श्रीकांत मिश्र, महावीर प्रसाद शर्मा ‘विप्लव’, नंदू बाबू, शिवकुमार बाबू, ब्रजमोहन प्रसाद सिंह आदि थे।

संस्था प्रारंभ में श्रीकृष्ण पुस्तकालय परिसर से संचालित होती थी, बाद में सरस्वती भवन में स्थानांतरित हुई — जिसे इसका स्वर्णिम काल माना जाता है।


नेतृत्व परिवर्तन एवं विकास

तिवारीजी का अध्यक्षीय कार्यकाल अल्प रहा।
बाद में:

  • बाबू महेश्वर प्रसाद नारायण सिंह (अध्यक्ष)

  • डॉ. दामोदर प्रसाद (अध्यक्ष)

  • बालेश्वर प्रसाद सिंह (सचिव)

संस्था ने 77 वर्षों में अनेक उतार-चढ़ाव देखे, परंतु साहित्यिक-सांस्कृतिक दायित्व से कभी विमुख नहीं हुई।


प्रथम आयोजन — कौमुदी महोत्सव (18 अक्टूबर 1948)

पहला सार्वजनिक आयोजन कौमुदी महोत्सव था — आश्विन पूर्णिमा की रात्रि में।
अध्यक्षता: आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री
प्रतिभागी: हंस कुमार तिवारी, रामगोपाल शर्मा ‘रुद्र’, सरयू सिंह ‘सुंदर’ आदि।

कौमुदी महोत्सव आर्यावर्त की प्राचीन परंपरा से जुड़ा है — शरद पूर्णिमा की रात्रि में चाँदनी में संगीत, नृत्य और साहित्य की साधना।

यह आयोजन 77 वर्षों में कभी बाधित नहीं हुआ


स्वर्णिम काल — महान साहित्यकारों का आगमन

1953 में सीढ़ीघाट पर नावों पर मंच बनाकर भव्य आयोजन हुआ —
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने रश्मिरथी का पाठ किया:
“याचना नहीं, अब रण होगा…”

दर्शक स्तब्ध थे; यह दृश्य वर्षों तक याद रहा।

मंच पर आने वाले दिग्गज साहित्यकारों में शामिल थे:
अज्ञेय, नागार्जुन, नीरज, गोपाल सिंह नेपाली, काका हाथरसी, रामावतार अरुण, अरुण कमल, आलोक धन्वा, मदन कश्यप आदि अनेक विभूतियाँ।


नए मंडलों का गठन (1953–1958)

  • 1953 — संगीत मण्डल : शास्त्रीय एवं सुगम संगीत के आयोजन

  • 1954 — मिलन मण्डल : वाचनालय, खेल, त्योहारों पर सांस्कृतिक गतिविधियाँ

  • 1957 — महिला मण्डल

  • 1958 — शिशु मण्डल

इन्हें मिलाकर किरण मण्डल जनपद का महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्र बन गया।


किरण पत्रिका का प्रकाशन

हस्तलिखित काल के बाद मुद्रित संस्करणों का प्रकाशन हुआ:

  • रेखाएँ

  • जागरण

  • स्वर्ण जयंती स्मारिका (1998)

  • किरण रचना वार्षिकी (2002)

  • किरण 2003

2013 से किरण वार्ता नए स्वरूप में प्रकाशित हो रही है।
2025 में “बेशरम हवा चली” कविता-संग्रह का लोकार्पण हुआ।


नई समिति और कौस्तुभ जयंती (प्लैटिनम जुबिली)

वर्तमान अध्यक्ष: डॉ. व्रजकुमार पाण्डेय
वर्तमान सचिव: डा. शैलेंद्र राकेश

नई कमिटी का पहला प्रमुख आयोजन — कौस्तुभ जयंती (70 वर्ष)।
दो दिवसीय आयोजन में पहला दिन: गीत-ग़ज़ल,
दूसरा दिन: सेमिनार — अध्यक्षता: अरुण कमल।
विषय: भारतीय लोकतंत्र में समाज की घटती भूमिका

यह आयोजन सफल रहा और पुराने स्वर्णिम दिनों की स्मृति ताज़ा कर गया।


तकनीकी युग की नई चुनौतियाँ और किरण मण्डल का संकल्प

एआई और डिजिटल संसाधनों के दौर में साहित्य के रूप बदल रहे हैं—
लेकिन क्लासिक साहित्य, भारतीय ग्रंथ, महान कवियों-लेखकों की परंपरा को संरक्षित रखना आवश्यक है।

किरण मण्डल निष्ठा, समर्पण और सांस्कृतिक चेतना के संरक्षण को अपना दायित्व मानते हुए सक्रिय है और साहित्यिक-सांस्कृतिक मशाल को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है।

— डा. शैलेंद्र राकेश